ये कैसा बचपन

Child labour in India, Child labour bill, Lost childhood, hindi poem on child labour, बाल श्रम पर हिन्दी कविता

नन्ही आँखों की ओझल छाया में खोता बचपन,
कभी धूल, तो कभी भूख की आग में सूखता बचपन.

छोटे छोटे हाथों में खिलोने के बजाए भीक का तोहफा आया,
गालियों की मार ने, न जाने कितनी बार उसके मासूम मन को देहलाया.

दिन के शोर, तो कभी रात के सन्नाटे में तड़पता बचपन,
कभी बरसात, तो कभी सर्दी में ठिठुरता बचपन.

दिन थे जब स्कूल जाने के तब गरीबी के भोज को उसने कांधे पर उठाया,
बिस्तर पर पड़ी बीमार माँ और रोती बेहना को चुप कराया.

गली-कूचों, तो कभी महलों की देहलीज़ो पे रेंगता बचपन,
कभी हवस, तो कभी चरस का शिकार होता बचपन.

छोटे छोटे पैरों पे उसने खड़ा होना सीख लिया,
पेट को पालना था इसलिए शरीर को बेचना सीख लिया.

बाप की शराब, तो कभी निवालो के अभाव में रोता बचपन,
कभी दंगो, तो कभी रिवाजों पे बलि चढ़ता बचपन.

वो बचपन जो कभी उसका हो ना पाया,
उम्र सिर्फ़ 14 थी, जब उसने मौत को गले लगाया.

दुनिया की भीड़ में बेनामी को जीता बचपन,
कभी स्कूटर तो कभी ट्रकों के नीचे कुचलता बचपन.

ये कैसा बचपन जो श्रम जीवन का अभ्यास करे,
नेताओं के झूठे वादों और समाजिक तानाशाही की बकवास सहे.

इंतज़ार का अब वक्त नहीं, अभी नहीं तो कभी नहीं,
एसी भी क्या आन जो इंसानियत को बदनाम करे.

खेल तो सारा वख्त का है मुसाफिर,
हो सकता था ये तेरा बचपन,
हो सकता था ये मेरा बचपन.

Leave a Reply

2 Comments on "ये कैसा बचपन"

Notify of

Saumy Nagayach
11 months 1 day ago

This is really a heart touching poem. Message so beautifully conveyed.
Thanks for sharing this 🙂

Zaman Khan
2 months 30 days ago

Nicee….it is true

wpDiscuz